Saturday, April 30, 2011

अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको


अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको

मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको

ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको

मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे
तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ " रवि"
शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको

Friday, April 29, 2011

माँ

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन
, चिमटा फुँकनी जैसी माँ ।
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे
,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ ।
चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली
,
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
, घर की कुंड़ी जैसी माँ ।
बीवी
, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां ।
बाँट के अपना चेहरा
, माथा, आँखें जाने कहाँ गई ,
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी माँ

सुख देती हुई माओं को गिनती नहीं आती
पीपल की घनी छायों को गिनती नहीं आती।
लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती
,
बस एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती।
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।
मैंने रोते हुए पोछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों
से माँ ने नहीं धोया दुप्पट्टा अपना।
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
,
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ
जाती हे
सर्दी में मौसम से बचाती, तन के कपडे जैसी माँ
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,







Tuesday, April 26, 2011

अपने दिलो में मुझको जला कर रखना

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।


"रवि" तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में
मुझको जला कर रखना

Monday, April 25, 2011

साथी, सब कुछ सहना होगा

साथी, सब कुछ सहना होगा!

मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधो में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

आ‌ओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

Friday, April 22, 2011

Analysis of Our Emotional Brain


The emotional brain is driven by our dopamine system. Dopamine is responsible for our emotions and is the fuel of our hidden decision-making.
While it may seem that our emotions are somewhat instinctual, hence fixed, they are quite the contrary. In fact, they reflect the emotional brain’s view of how the world is working at a particular point in time.
Dopamine is our reward system and dopamine neurons run on experience and expectation. If dopamine neurons predict a reward (based on past experience) and the reward happens, we feel pleasure and the neurons retain the connection. But, if the predicted reward does not happen, the dopamine neurons record the error for future reference.
Decisions from the emotional brain happen quickly, with little information, and feel like instinct or intuition. Because a conclusion from the emotional brain is not rooted in logic, we are unable to justify it. Instead, we feel that it is right, no reasons why.

Strengths and Weaknesses of Our Emotional Brain:

Strengths
Weaknesses
Knows more than we think we know
Creates our wisdom
Excels at complex decisions (too many factors)
Erroneously perceives patterns in randomness
Feels loses more than gains
Over-values immediate gains
Is useless with numbers

Strengths:
The emotional brain knows more than we think we do. It is always busy deciding how the world is working based on what we are experiencing and then rewiring itself. As Lehrer states, “Even when we think we know nothing, our brains know something. That’s what our feelings are trying to tell us.”
Science confirms that the emotional brain is how we become experts. An expert is someone “having, involving, or displaying special skill or knowledge derived from training or experience”. Human expertise results, not from executing logic, but from our emotions. Because experts make decisions without the overhead of logic, experts appear to operate effortlessly, on autopilot, no explanations necessary.
The emotional brain is best for decisions for which the quantity of conditions is overwhelming and there is too much information for us to process with logic. “Complex problems….require the processing powers of the emotional brain, the supercomputer of the mind.”

Weaknesses:
Unfortunately, the emotional brain prefers to find patterns (dare we say, logic) where there is only randomness. It also likes to feel good and so it seeks to maximize rewards, especially unpredictable ones. Combining its susceptibility for invisible patterns and maximizing rewards, it can become quite excited when a slot machine, for no explainable reason, results in a win.
The emotional brain feels worse from losses than it feels good from gains. Lehrer gives an intriguing example. Credit cards alter the chemistry of our buying decisions! When we pay cash, we feel the immediate loss of money, a bad feeling. However, when we use credit cards, we feel the immediate gain of the purchased item without immediate loss (the loss is delayed). Each of these buying experiences activates a different part of the brain.
The emotional brain over-values immediate gains. While all gains feel good, immediate gains feel even better. Lehrer’s examples are fascinating. One is the temptation of subprime mortgages. The immediate gain that feels good is the buying of a house with a low fixed interest rate for the immediate future. The related loss – the higher variable interest rate – occurs in the more distant future. Therefore, the emotional brain is delighted with subprime mortgages. In fact, Lehrer points out that even people who qualified for better financial terms of conventional mortgages fell prey to the brain’s delight with immediate gain.